मार्च में होना है ब्रेक्जिट, जानिए क्या है यह, दुनिया पर क्या होगा इसका असर

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लंदन। ब्रिटेन के एक वरिष्ठ मंत्री ने आगाह किया है कि प्रधानमंत्री टेरेसा मे के ब्रेक्जिट सौदे को अगर ब्रिटिश सांसद खारिज कर देती है, तो यूरोपीय यूनियन (ईयू) से बाहर होने की ब्रिटेन की संभावना केवल 50 फीसद है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार सचिव एवं 2016 के जनमत संग्रह के दौरान ब्रेक्जिट के मुखर प्रचारक रहे लियाम फॉक्स ने थेरेसा मे के खिलाफ वोट करने की योजना को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि केवल थेरेसा मे की योजना ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि ब्रिटेन ईयू से अलग हो जाए।

ब्रेक्सिट क्या है और कब आएगा अमल में

ब्रेक्सिट शब्द, दो शब्दों ब्रिटेन और एक्जिट से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ब्रिटेन का यूरोपियन संघ से अलग होना। बताते चलें कि ब्रेक्जिट की तारीख 29 मार्च 2019 तय की गई है। इसी बात को लेकर ब्रिटेन में साल 2016 में जनमत संग्रह हुआ था, जिसमें लोगों का बहुमत ब्रिटेन के ईयू से अलग होने के पक्ष में दिया था। ब्रेक्जिट पर जनमत संग्रह के रुझान के बाद कैमरुन सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। तब कंजरवेटिव पार्टी की थेरेसा मे की अगुवाई में सरकार बनी थी।

ब्रेक्जिट से अलग होने में अब तीन महीने का कम समय बचा है, लेकिन अभी तक ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में यह तय नहीं हो पाया है कि ब्रेक्जिट के बाद दोनों के बीच व्यापारिक संबंध किस तरह का होगा। कुछ लोग ईयू के साथ सारे संबंध खत्म करने के पक्ष में है, जो ब्रिटेन को ईयू के मुक्त व्यापार संघ से पूरी तरह अलग कर देगा। साथ ही दुनियाभर में उसे देशों के साथ नए व्यापारिक समझौते करने की अधिक आजादी देगा।

वहीं, रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यूरोपीय यूनियन (ईयू) से निकलने के बावजूद ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे की योजना उसके साथ मजबूत आर्थिक संबंधों को बनाए रखने की है। इसे सेमी बेक्जिट कहा जा रहा है। इसके लिए उन्हें ईयू की कई शर्तें माननी होंगी। वह बाहर रहकर भी यूरोपियन यूनियन के साथ बना रहेगा, जिससे आर्थिक हितों, रोजगार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ब्रिटेन से बाहर जाने से बचाया जा सके।

दुनिया पर क्या होगा असर…

ब्रेक्जिट के फैसले के बाद ही डॉलर के मुकाबले पाउंड की स्थिति कमजोर हो गई थी। ब्रिटेन में करीब 800 से अधिक भारतीय कंपनियां हैं। ब्रेक्जिट के बाद इनके व्यापार में भी असर होगा क्योंकि इनमें से कई ओपन यूरोपियन मार्केट में बिजनेस करती हैं। ब्रेक्जिट के बाद यूरोप के अन्य देश ब्रिटिश लोगों के लिए अपने रास्ते बंद कर देंगे। अभी तक यूरोप में रह रहे लोग एक दूसरे देश में बिना किसी रुकावट, वीजा आदि की समस्या होगी। ब्रिटेन का आधा से अधिक निर्यात ईयू के देशों को ही होता है। ईयू से अलग होने पर न केवल ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है और एकीकृत यूनाइटेड किंगडम के तौर पर उसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के फैसले पर ऑस्ट्रेलियाई शेयर बाजार को भी बड़ा झटका लगेगा।

ब्रेक्जिट का फैसला क्यों लिया गया

साल 1975 में ईयू से जुड़ने के बाद ब्रिटेन की यूरोपियन यूनियन में कभी चली ही नहीं। ब्रिटेन के लोगों की जिंदगियों पर ईयू का नियंत्रण ज्यादा है और वह व्यापार के लिए ब्रिटेन पर कई शर्तें लगाता है। इसके साथ ही राजनीतिक दलों को लगता है कि अरबों पाउंड की सालाना मेंबरशिप देने के बाद भी ब्रिटेन को इससे कोई ज्यादा लाभ नहीं होता। इसलिए बेक्जिट की मांग उठी थी।

कई राजनीतिक दलों और लोगों का मानना है कि ब्रेक्जिट के बाद हो सकता है कि शुरू में ब्रिटेन को मुश्किलों का दौर देखना पड़े। मगर, फिर ब्रिटेन मजबूती से अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा। ब्रेक्जिट के बाद भी ब्रिटेन यदि यूरोपीयन यूनियन से जुड़कर रहना भी चाहता है, तो वह अपनी शर्तों पर रहेगा न कि यूरोपीय यूनियन की शर्तों पर।

कौन चाहते हैं कि ईयू में रहे ब्रिटेन

पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन चाहते थे कि ब्रिटेन ईयू में रहे। लेबर पार्टी, एसएनपी, प्लाएड कमरी और लिबरल डेमोक्रेट्स सभी ईयू में रहने के पक्ष में हैं। वहीं, कंजर्वेटिव पार्टी ने इस प्रचार में निष्पक्ष रहने की शपथ ली। ईयू के अन्य सदस्य देश जैसे फ्रांस और जर्मनी भी चाहते हैं कि ब्रिटेन उनके साथ रहे।

अगर ब्रेक्जिट होता है, तो ब्रिटेन को ईयू से निकलने में कम से कम दो साल का समय लगेगा। इस दौरान ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के संधियों और कानून का पालन करना होगा। किसी भी तरह के निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी हिस्सेदारी नहीं होगी क्योंकि उसने 27 देशों के संघ के साथ ‘विदड्रावल समझौता’ किया होगा।

ईयू में 28 सदस्य देश हैं

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए यूरोपियन यूनियन का निर्माण हुआ था। मकसद था कि एक साथ व्यापार करने वाले देश एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध नहीं करेंगे। इसमें 28 यूरोपीय देशों की आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी है। इसकी अपनी मुद्रा यूरो है, जिसका 19 सदस्य देश इस्तेमाल करते हैं। ईयू की अपनी संसद भी है और यह कई क्षेत्रों में अपने नियम बनाता है, जिसमें पर्यावरण, परिवहन, उपभोक्ता अधिकार और मोबाइल फोन की कीमतें तक तय होती हैं।

Courtesy….NaiDunia