अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जन्मदिन: खड़ी बोली में साहित्य का पहला महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ लिखने वाले कवि

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नई दिल्ली: जब बात हिन्दी में खड़ी बोली की होती है तो एक नाम जो बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है वह नाम है अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का. उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में 1890 ई. के आस-पास अयोध्यासिंह उपाध्याय ने साहित्य सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया. द्विवेदी युग के कवियों में यह कवि ऐसे थे जिन्होंने खड़ी बोली का पहला महाकाव्य लिखा. हिन्दी साहित्य में अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का वही स्थान है जो हिन्दी कथा जगत में‘उसने कहा था’ के कथाकार ‘चंद्रधर शर्मा गुलेरी’ का है.

 

इससे पहले कि हम उनकी महाकाव्य पर बात करें आईए जानते हैं उनके बारे में

 

अयोध्यासिंह उपाध्याय का जन्म ज़िला आजमगढ़ के निज़ामाबाद नामक स्थान में सन् 1865 ई में हुआ था. हरिऔध के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था. सेहत ठीक न रहने की वजह से हरिऔध का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अंतः इन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला और अंग्रेज़ी का अध्ययन किया. 1883 में ये निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए. 1890 में क़ानून की परीक्षा पास की. 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी बने.

 

खड़ी बोली में लिखा पहला महाकाव्य

 

हरिऔध के समय में खड़ी हिन्दी का प्रयोग तो हो रहा था किन्तु उसका काव्यात्मक कलेवर व्रजभाषा और अवधी से बिल्कुल मुक्त नहीं हो पाया था. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी हिन्दी का स्वरूप ‘सरस्वती’ के माध्यम से गढ़ रहे थे जिसे मानक हिन्दी माना गया और उनकी प्रेरणा से कविगण इसमें कविता लिख रहे थे.

 

हरिऔध भारतीय पुरातन संस्कृति के पोषक थे और इसलिए उन्होंने काव्य सृजन के भारतीय प्रतिमानो को अपनाया और खड़ी बोली में अपने पहले महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ (1914) की रचना की. हरिऔध ने शुरुआत में ब्रजभाषा में लिखना शुरू किया. उन्होंने ‘रस कलश’ की रचना इसी भाषा में की थी, किन्तु समय के प्रवाह को देखते हुए वे खड़ी बोली की ओर उन्मुख हुए और इसी में रचना करने लगे जिसकी चरम परिणति ‘ प्रिय प्रवास’ के रूप में हुई. सत्रह सर्गों में विभाजित ‘प्रिय प्रवास’ में ‘कृष्ण के दिव्य चरित का मधुर, मृदुल व मंजुलगान’ किया गया है.

 

इससे पहले मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी बोली में ‘जयद्रथ वध’ की रचना की थी

 

इनसे पूर्व मैथिलीशरण गुप्त खड़ी बोली में ‘जयद्रथ वध’ की रचना कर चुके थे लेकिन यह एक खण्डकाव्य ही था. इस प्रकार ‘प्रिय प्रवास’ को खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम प्रबन्ध और हरिऔध को पहला महाकवि होने का गौरव प्राप्त है.

 

हरिऔध के ही शब्दों में, ”मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्रथ वध’ नि:संदेह मौलिक ग्रंथ है, परन्तु यह खंड-काव्य है. इसलिए खड़ी बोलचाल में मुझको एक ऐसे ग्रंथ की आवश्यकता देख पड़ी, जो महाकाव्य हो और ऐसी कविता में लिखा गया हो, जिसे भिन्न तुकांत कहते हैं.  मैं इस न्यूनता की पूर्ति के लिए कुछ साहस के साथ अग्रसर हुआ और अनवरत परिश्रम करके ‘प्रिय प्रवास’ नामक ग्रंथ की रचना की.”

 

हरिऔध ने प्रिय प्रवास’ के अलावा ‘पारिजात’ और ‘वैदेही वनवास’ शीर्षक से दो प्रबंध काव्य लिखे. इसके अलावा ‘प्रद्युम्न विजय’ और ‘रुक्मिणी परिणय’ जैसी नाट्यकृति भी लिखी. हिरऔध ने इसके अलावा ‘प्रेमकांता’, ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ और ‘अधखिला फूल’ नामक उपन्यास भी लिखा. जैसे मुंशी प्रेमचंद उपन्यास सम्राट कहे जाते हैं, जयशंकर प्रसाद नाटक सम्राट कहे जाते हैं वैसे ही हरिऔध अपने प्रशंसकों द्वारा ‘कवि सम्राट’ कहे जाते हैं.

 

क्या है खड़ी बोली

 

खड़ी से अर्थ है खरी अर्थात शुद्ध अथवा ठेठ हिंदी बोली है. शुद्ध अथवा ठेठ हिंदी बोली या भाषा को उस समय खरी या खड़ी बोली के नाम से संबोधित किया गया जबकि हिंदुस्तान में अरबी फारसी और हिंदुस्तानी शब्द मिश्रित उर्दू भाषा का चलन था.

 

खड़ी बोली हिन्दी भारत की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है. व्यवहार में यह उस भूभाग की भाषा मानी जाती है. जिसकी सीमा पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पशिचम में अम्बाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी प्रदेश, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण-पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पशिचम में खंडवा तक पहुंचती है. इस विशाल भूभाग के निवासियों के साहित्य, पत्र-पत्रिका, शिक्षा-दीक्षा, आपस में वार्तालाप इत्यादि की भाषा खड़ी बोली हिन्दी है, जिसे स्थानीय बोलियों की छाया मिली रहती है.

Courtesy: ABP News